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ब्रह्मपुत्र नद - संस्कृति और सभ्यता का संगम

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  • August-19-2019
संक्षिप्त परिचय -
संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक मानी जाने वाली ‘ब्रह्मपुत्र’ नद भारत की प्रमुख व पवित्रतम नदियों में से एक है. इस नद का उद्गम ‘चेमायूंगडंग’ नामक हिमनद से होता है, जिसे दक्षिण- पश्चिमी तिब्बत में स्थित मानसरोवर झील के निकट ‘ब्रह्मकुंड’ के नाम से जाना जाता है. ब्रह्मकुंड से निकलने के कारण ही इस नद को ‘ब्रह्मपुत्र’ के नाम से संबोधित किया जाता है. सिंधु नदी के बाद यह भारत की दूसरी सबसे लम्बी नदी है. ब्रह्मपुत्र नद तीन देशों चीन, भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 2900 किलोमीटर की लम्बी यात्रा करती है. यह नद अपनी इस यात्रा के दौरान चार अलग – अलग नामों से जानी जाती है –

1- चीन के तिब्बत पठार पर सांग्पो नदी    
2- अरुणाचल में दिहांग नदी   
3- असम घाटी में ब्रह्मपुत्र   
4- बांग्लादेश में जमुना नदी. 

भारत में यह नद प्रमुख रूप से पश्चिमी क्षेत्रों असम व अरूणाचल प्रदेश में बहती है. जहां से यह बांग्लादेश में जमुना नदी के रूप में प्रवेश करती है तथा अंत में बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है. ब्रह्मपुत्र वास्तव में एक नदी नहीं बल्कि एक ‘नद’ है, जिसे आम बोलचाल में इसे नदी कहा जाने लगा.

ऐतिहासिक महत्व -
ब्रह्मपुत्र नद का उद्गम एवं अंत दोनों ही भारत से बाहर होता है, इसलिए इसका कोई विशेष पौराणिक प्रमाण नहीं मिलता, किन्तु महाभारत में ब्रह्मपुत्र नद का कई जगह वर्णन देखने को मिलता है. इस नद में लाल मिट्टी अधिक मात्रा में पाई जाती है, जिसके कारण प्राचीन समय में लाग इसे ‘लोहित’ या ‘लौहित्य’ नामों से भी जानते थे. 

असम की संस्कृति व सभ्यता ने इसी नद के तट पर जन्म लिया व विकसित हुई. इसकी घाटी में ही कामरूप, हेडम्ब, शोड़ितपुर, कौड़िल्य जैसे प्राचीन राज्य पनपे. इसके अलावा इस नद ने भीमा, वर्मन, पाल, शालस्तंभ, देव, कमता, चुटिया, भूयो कोटि वंशीय राज्यों को भी अपने किनारों पर बनते बिगड़ते देखा है. 

प्रवाह क्षेत्र व सहायक नदियां -
ब्रह्मपुत्र नद अपने उद्गम स्थान से निकलकर तीन देशों की यात्रा तय करती है. शुरू में यह हिमालय के साथ – साथ पूर्व की ओर बहती है तथा अपने पूरे ऊपरी मार्ग में यह ‘सांग्पो’ के नाम से जानी जाती है. तिब्बत में यह कुछ उपनदियों को समाहित करती है, जिसमें कि लो-कात्सांग- पू, ला-सा (की), नी- यांग (ग्यामडा), निएन-चू (न्यांग चू) नदियां शामिल हैं.

ब्रह्मपुत्र नद हिमालय के सबसे पूर्वी चोटी नामचा वरना के समीप अचानक यू टर्न लेकर पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल में प्रवेश करती है तथा अरुणाचल में विशाल हिमालय को काटकर एक गहरे खड्ड या गार्ज का निर्माण करती है जिसे दिहांग गार्ज कहते हैं. भारत में सादिया शहर के पश्चिम में दिहांग दक्षिण-पश्चिम की ओर मुड़ती है, इसमें दो पहाड़ी जलधाराएं लोहित और दिबांग मिलती है. 

इस संगम के बाद ब्रह्मपुत्र असम के समतल मैदान में प्रवेश करती है. असम में ब्रह्मपुत्र गुंफिल जल मार्ग बनाती है, इस जल मार्ग में ब्रह्मपुत्र में कई नदी द्वीप पाये जाते है, जहां इसमें सुबनसिरी, कामेग, भरेली, धनसारी, मानस (जो कि भूटान से निकलकर असम में मिलती है), चंपामती, सरलभंगा, धनुश्री, जियाभरेली, पगलादिया, पिथुमारी, नदियों सहित कई तेजी से बहती हिमालयी नदियों से इसका मिलन होता है. 

बांग्लादेश में चिलमारी के निकट से बहने के पश्चात् इसके दायें तट पर सिक्किम के जेमू ग्लेशियर से निकली तीस्ता नदी इससे मिलती है. गंगा के संगम से पहले जमुना में बायें तट से बरल, अतरई, और हुरसागर नदियां भी ब्रह्मपुत्र में आकर समाहित हो जाती हैं. 

गवालन्दो घाट के उत्तर मे जमुना (ब्रह्मपुत्र) गंगा से मिलती है, जिसकी सयुंक्त धारा ‘पद्मा’ नदी के नाम से जानी जाती है. किन्तु जब मणिपुर से निकलने वाली बराक या मेघना नदी जब बांग्लादेश के चाँदपुर के निकट पद्मा नदी से मिलती है, तो इसकी संयुक्त धारा मेघना नदी कहलाती है और तिब्बत की त्यांगपो, अरुणाचल की दिहांग, असम की ब्रह्मपुत्र, बांग्लादेश की जमुना अन्त में मेघना नदी के रूप में बंगाल की खाड़ी की गोद मे समा जाती है.

ब्रह्मपुत्र के तट पर बसे प्रमुख स्थल -
सांस्कृतिक महत्व के साथ ही ब्रह्मपुत्र नद धार्मिक दृष्टिकोण से भी अत्याधिक महत्वपूर्ण है. शंकरदेव, माधवदेव, दामोदरदेव जैसे अनेक महान संतों ने इसी नद के तट पर जन्म लिया. यही नहीं बल्कि शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन, सिख धर्मों के मंदिर, सत्र ,गुरुद्वारे, दरगाह– मस्जिदें और चर्च भी ब्रह्मपुत्र नद के तटों पर बने हुए हैं. असम का पर्याय ‘कामाख्या देवी’ का शक्ति पीठ भी इसी नद के किनारे स्थित है. वहीं ध्रुबड़ी का प्रसिद्ध गुरुद्वारा दमदमा साहिब ब्रह्मपुत्र के तट पर बना है, जहां पर गुरु नानकदेव और गुरु तेगबहादुर स्वयं पधारे थे. 

ब्रह्मपुत्र नद असम के लिए वैसे तो वरदान है, किन्तु जब वह कुपित होकर अपना विकट रूप धारण करती है तो असमवासियों का बहुत कुछ हरण भी कर लेती है. ब्रह्मपुत्र नद अक्सर असम व आस- पास के क्षेत्रों में विकराल बाढ़ लेकर आती है.

 

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